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विशेष सूचना- Arya Samaj तथा Arya Samaj Marriage और इससे मिलते-जुलते नामों से Internet पर अनेक फर्जी वेबसाईट एवं गुमराह करने वाले आकर्षक विज्ञापन प्रसारित हो रहे हैं। अत: जनहित में सूचना दी जाती है कि इनसे आर्यसमाज विधि से विवाह संस्कार व्यवस्था अथवा अन्य किसी भी प्रकार का व्यवहार करते समय यह पूरी तरह सुनिश्चित कर लें कि इनके द्वारा किया जा रहा कार्य पूरी तरह वैधानिक है अथवा नहीं। Kindly ensure that you are solemnising your marriage with a registered organisation and do not get mislead by large Buildings or Hall. For More information contact us at - 09302101186
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  • दूसरा पहलू

    दूसरा पहलू -  अब व्यक्ति का इतना विकास हो गया है कि एक का व्यक्तित्व दूसरे से मेल नहीं खाता। सो उस दूसरे व्यक्ति के नजरिए को भी देखने की कोशिश कीजिए, आपको दूसरा पहलू भी नजर आने लगेगा। आत्माभिव्यक्ति किसी भी इंसान की सबसे बड़ी जरूरत होती है। सुनिए, अच्छे श्रोता बनिए। सिर्फ अपनी नहीं, उनको भी पसंद जानिए।• Now people have evolved to...

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गरीब देश की आर्थिक दशा - 

गरीब देश की गरीबी कोई अदृश्य या काल्पनिक नहीं थी और ना हि किसी ने उसे किताबों से निकालकर नारों की शक्ल दी थी। राजाओं के लिए तो मान्यता थी कि वे देश की गरीबी की परवाह नहीं करते थे और खुद की शहनशाही शान-शौकत और अय्याशी जनता के खर्च पर करते रहते थे। उनका तो जन्म ही महलों में रेशम की गुदडियों में और चाँदी के चमचों के साथ जुड़ा होता था। परन्तु उन राजाओं की राजाशाही हटाकर हमने लोकशाही का रास्ता अपनाया। इसमें जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हमारे नए राजा होते हैं। वे जन प्रतिनिधि जनता के बीच से जनता की स्थिति में से ही चुने हुए लोग होते हैं। उनमें भी कई एक तो अत्यंत साधारण आर्थिक स्थिति वाले होते हैं। आजादी मिलने के पूर्व तक भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु अनेक वर्षों   तक 1933 से 1946 तक काँग्रेस पार्टी से रु. 300/- प्रतिमाह वेतन लेते रहे थे। इनकों महात्मा गाँधी ने अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी कहा था। भारत जैसे गरीब देश के प्रधानमंत्री बनने वाले जिनका कि पहनावा खादी का था और खादी सादगी का प्रतीक थी। परन्तु इन्हीं नेहरु जी ने प्रधानमंत्री पद पर बैठते ही शहनशाही शानशौकत से रहना शुरु कर दिया। उन पर तीस हजार रुपए प्रतिदिन का खर्च सरकारी खजाने से होता रहा। यह था उनका गांधीवादी स्वरूप और गांधीजी के उत्तराधिकार का पद।

गरीब देश की आर्थिक दशा देखने का उनके पास समय ही नहीं था। देश के नेता बनने के साथ-साथ उन्हें दुनियाँ की लीडरी का भी चस्का लग गया था। इस महत्वाकांक्षा के चलते प्रतिमाह इस देश में विदेशी मेहमानों का तांता लगा रहता था, जिनकी खातिरदारी में करोड़ों रुपये का खर्च होता था।

 

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